वेदमंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

आर्य समाज का इतिहास एवं सिद्धांत

ओ३म्

"वेदों की ओर लौटो" — महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी का अमर संदेश और संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए स्थापित आर्य समाज के 10 स्वर्णिम नियम।

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती (1824–1883)
आर्य समाज 200वीं जयंती

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती का जीवन व क्रांति

आधुनिक भारत के आध्यात्मिक राष्ट्रनायक व समाज सुधारक

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में हुआ था। उन्होंने बाल्यकाल में शिवरात्रि की रात्रि को चूहे को शिवलिंग पर चढ़ते देख मूर्तिपूजा के औचित्य पर गहन विचार किया और सत्य की खोज में गृहत्याग कर दिया।

मथुरा में प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द जी से वेदों और आर्ष ग्रंथों का गहन अध्ययन प्राप्त करने के पश्चात, उन्होंने गुरु दक्षिणा के रूप में अपना सम्पूर्ण जीवन वेदों के सत्य प्रचार और भारत से अज्ञान, अंधविश्वास तथा सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए समर्पित कर दिया।

10 अप्रैल 1875 को मुंबई के काकड़वाड़ी में उन्होंने ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। उनका मूल मंत्र था — "कृण्वन्तो विश्वमार्यम्" (सारे संसार को श्रेष्ठ बनाओ) तथा "वेदों की ओर लौटो"।

दश नियम — जीवन जीने का आर्ष दर्शन

ओ३म्

ये दस नियम सार्वभौमिक, जाति-धर्म से परे और समस्त मानव जाति के नैतिक व आत्मिक उत्थान का आधार हैं।

नियम १

ईश्वर ही सब सत्यविद्या का आदिमूल

सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सब का आदिमूल परमेश्वर है।

नियम २

परमेश्वर का स्वरूप

ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है।

नियम ३

वेद सब सत्यविद्याओं की पुस्तक

वेद सब सत्यविद्याओं की पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।

नियम ४

सत्य के प्रति तत्परता

सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये।

नियम ५

धर्मानुसार आचरण

सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहियें।

नियम ६

संसार का उपकार

संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।

नियम ७

प्रीतिपूर्वक यथायोग्य व्यवहार

सब से प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिये।

नियम ८

अविद्या का नाश व विद्या की वृद्धि

अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।

नियम ९

सर्वहित में अपनी उन्नति देखना

प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिये, किन्तु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।

नियम १०

सामाजिक सर्वहितकारी नियमों का पालन

सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतन्त्र रहें।

आर्य समाज मंदिर, दानापुर (पटना)

आर.पी.एस. मोड़, बेली रोड स्थित हमारा यह आर्य समाज मंदिर पटना और आसपास के समस्त श्रद्धालु परिवारों के लिए वैदिक संस्कार, विवाह एवं शांति यज्ञ का एक विश्वसनीय व पावन केंद्र है।

पंडित ओम प्रकाश आर्य विगत 25 से अधिक वर्षों से इस मंदिर के माध्यम से वेद मंत्रों के शुद्ध उच्चारण, बिना दहेज वैदिक विवाह, नामकरण, मुंडन, उपनयन तथा यज्ञ हवन के प्रचार-प्रसार में समर्पित भाव से सेवारत हैं।

पंडित ओम प्रकाश आर्य

पंडित ओम प्रकाश आर्य (वैदिक पुरोहित)

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